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फसलों में होने वाले रोग से बचाने के लिए किसान पाठशाला में दी गई जानकारी




बृजभूषण रजक रिपोर्ट 
आजमगढ़ : किसान पाठशाला के चौथे दिन जनपद के कुल 245 न्याय पंचायतों में 14731 किसानों ने प्रतिभाग किया, जिसमें 2968 महिला कृषकों की सहभागिता थी। 
पल्हनी विकास खंड के गांव जाफरपुर के जूनियर हाई स्कूल में आयोजित किसान पाठशाला को संबोधित करते हुए कृषि विज्ञान केंद्र कोटवा के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ0 आरके सिंह द्वारा बताया गया कि खरीफ की फसलों में फसल सुरक्षा एवं जल प्रबंधन महत्वपूर्ण घटक है। अतः किसान भाइयों को कीट एवं रोग बीमारियों से बचाव तथा जल प्रबंधन पर विशेष ध्यान देना चाहिए। दीमक से बचाव के लिए उनके द्वारा बताया गया कि नीम की खली 10 कुंतल प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई से पूर्व खेत में मिलाने से दीमक के प्रकोप में कमी आती है, इसी प्रकार जैविक फफूंद नाशक विवेरिया बेसियाना ढाई किलोग्राम प्रति हेक्टेयर मात्रा को साठ से सत्तर किलोग्राम गोबर की खाद में मिलाकर हल्के पानी का छींटा देकर 8 से 10 दिन तक छाया में रखने के उपरांत बुवाई के पूर्व अंतिम जुताई पर भूम में मिला देने से दीमक सहित भूमि जनित कीटों का नियंत्रण हो जाता है। उन्होंने गन्ना में सफेद गिडार नियंत्रण के लिए भी विवेरिया बेसियाना को उपयोगी बताया। इसी प्रकार उड़द व मूंग तथा सब्जियों की फसलों में लगने वाले कीट रोग प्रबंधन की जानकारी दी गई। उकठा रोग से बचाव के लिए फसल चक्र अपनाने पर बल दिया तथा ट्राइकोडर्मा को सड़ी हुई गोबर की खाद में मिलाकर फसल की बुवाई तथा रोपाई से पूर्व प्रयोग करने से जड़सड़न तथा उठा रोग की समस्या दूर की जा सकती है। 
संस्थान के ही वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ रणधीर नायक ने कृषि रक्षा रसायनों के प्रयोग में सावधानियां बरते जाने की सलाह देते हुए बताया कि लाल चिन्ह वाले रसायन सबसे अधिक जहरीले होते हैं, उसके बाद पीला चिन्ह वाले रसायन फिर नीला चिन्ह वाले रसायन जबकि हरा चिन्ह वाले रसायन सुरक्षित माने जाते हैं। उन्होंने कहा कि कीट एवं बीमारियों की अच्छी तरह पहचान करने के उपरांत ही संस्तुति रसायन का प्रयोग करना चाहिए। डॉक्टर नायक द्वारा बताया गया कि जल महत्वपूर्ण है, अतः इसका सम्यक प्रबंधन किया जाना अति आवश्यक है। जल संरक्षण हेतु गर्मियों की जुताई, खेतों की मेड़ बंधी, बौछारी विधि से सिंचाई, वृक्षारोपण तथा वर्षा जल को सुरक्षित करने के लिए अधिक से अधिक तालाबों का निर्माण की जाने पर बल दिया। 
कृषि विज्ञान केंद्र कोटवा के वैज्ञानिक डॉक्टर आरके आनंद द्वारा बताया गया कि नीम का पेड़ सभी किसान खाली पड़े खेतों में तथा मेड़ो में लगाएं क्योंकि इसके फल, पत्ती तथा इसके तेल में कीट एवं बीमारियों से बचाव बचाव के औषधीय गुण विद्यमान हैं। कृषि के साथ-साथ कृषि वानिकी को अपनाए जाने पर बल दिया। 
उप कृषि निदेशक डॉ0 आरके मौर्य ने बताया कि कृषि रसायनों को सरकारी गोदाम अथवा पंजीकृत कीटनाशक विक्रेताओं, जिनके पास वैध लाइसेंस हो से ही क्रय करना चाहिए। क्रय किए गए रसायन के पैकेट पर बैच नंबर, उत्पादन तिथि, तथा अवसान तिथि देख कर ही रसायन क्रय करना चाहिए। कालातीत तथा प्रतिबंधित एवं निषिद्ध रसायनों का क्रय कभी नहीं करना चाहिए। उन्होंने बताया कि कृषि रक्षा रसायन जहरीले प्रवृति के होते हैं, अतः रसायनों को खाने पीने की वस्तुओं से दूर अलग स्थान पर भंडार करना चाहिए और बच्चों से तथा जानवरों की पहुंच से दूर रखना चाहिए। 
गोष्ठी में ग्राम प्रधान मान बहादुर सिंह, सहायक विकास अधिकारी कृषि, जयराम वर्मा तथा 48 प्रगतिशील कृषक सम्मिलित रहे, जिसमें 12 महिलाएं भी उपस्थित रहीं। कार्यक्रम के समापन के अवसर पर उपस्थित समस्त किसानों को निशुल्क पुस्तिका वितरित की गई।


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